रामायण से सीखें लाइफ मैनेजमेंट … संजय की नज़र से

आज सुबह हमने रामायण एपिसोड देखा। अगर आप किसी कारण से यह नहीं देख पाए हो तो बहुत ही संक्षिप्त शदों में आज के इस धारावाहिक से जीवन से संबंधित जो 3 महत्वपूर्ण दृश्य-सूत्र को संक्षिप्त में इस प्रकार रखता हूँ : 

पहला दृश्य- धर्म व प्रलोभनः

हमने यह देखा कि रावण द्वारा सुग्रीव से मिलने के लिए दूत भेजा गया। दूत द्वारा सुग्रीव को विभिन्न तरह के प्रलोभन दिए गए। दूत में विभिन्न भौतिक सुख के रावण द्वारा प्रलोभन दिए जाने की बात कही। इस समय सुग्रीव द्वारा बहुत ही अच्छा जवाब दिया गया। सुग्रीव ने कहा या मैं मृत्यु के समय अपने भाई बाली को दिए गए वचन को भूल जाऊं। इसके अलावा सुग्रीव ने भौतिक सुख से अधिक महत्व धर्म को दिया। इस प्रकार सुग्रीव ने रावण के प्रलोभन को नकार दिया। आज के परिवेश में इससे हमें यह सीखने को मिलता है कि हमें भी बाहरी चकाचौंध व प्रलोभन में नहीं आना चाहिए योंकि आत्मिक सुख ही सबसे बड़ा सुख है। आत्मिक सुख की प्राप्ति धर्म के रास्ते पर चलने से ही प्राप्त होती है।

दूसरा दृश्य – सलाह व सोचः

राम व संपूर्ण वानर सेना दक्षिण में समुद्र तट के समीप पहुंच गई, विशाल सागर को सामने देखकर राम लक्ष्मण व संपूर्ण वानर सेना सोच में पड़ जाती है। ऐसे समय विभीषण राम अौर लक्ष्मण को समुद्र से रास्ता मांगने की सलाह देते हैं। लक्ष्मण को यह सलाह पसंद तो आती है परंतु लक्ष्मण सूर्यवंशी होने की बात कहकर यह बोलते हैं कि मांगना कायरों का काम होता है। इस पर राम अपनी असहमति व्यक्त करते हुए समुद्र देव से प्रार्थना करने की बात कहते हैं। इससे हमें यह सीख मिलती है कि कोई भी कार्य विनम्रता वह आग्रह से किया जाना चाहिए। आवेश व अधिकार की भावना से किया गया कार्य सही नहीं होता। राम व संपूर्ण वानर सेना समुद्र देव से 3 दिन तक विनम्रता से आग्रह करती है।

तीसरा दृश्य – मर्यादा, पंचतत्व एवं ईश्वरः

राम द्वारा तीन दिवस तक निराहार रहकर समुद्र देव से प्रार्थना की जाती है। समुद्र देव द्वारा रास्ता नहीं दिए जाने पर राम क्रोधित होते हैं। राम क्रोधित होकर ब्रह्मास्त्र का संधान करते हैं। भयभीत होकर समुद्र देव प्रकट होते हैं तथा क्षमा याचना करते हैं। करुणामय भगवान राम समुद्र देव को क्षमा कर देते हैं योंकि समुद्र देव पंचतत्व की मर्यादाओं को बतलाते हैं तथा समुद्र देव जल के मूल स्वभाव के बारे में समझाते हैं। राम तुरंत पंचतत्व के रूप में जल की मर्यादा को समझ जाते हैं। इसके आगे जल देव वास्तुविद्‌ नल नील की क्षमताओं के बारे में राम को अवगत करवाते हैं। यही स्थान आगे जाकर रामेश्वर धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस दृश्य से हमें यह सीख मिलती है कि विनम्रता आग्रह के पश्चात भी अगर कोई ना समझते तो क्रोध भी आवश्यक हो जाता है। लेकिन क्रोध भी नियंत्रित होना चाहिए। राम का अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण है। इसके अतिरिक्त यह भी विदित होता है कि अपनी गलती का आभास होने पर तुरंत क्षमा मांग ली जानी चाहिए।

डॉ. संजय बियानी

मोटिवेशनल स्पीकर, काउंसलर एवं शिक्षाविद्‌

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