Loan waiver won’t help farmers, sustainable development will

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The clamour for farm loan waiver has been rising in the country. The Odisha government recently rolled out a scheme call ‘KALIA’ (Krushak Assistance for Livelihood and Income Augmentation) for small farmers and landless agricultural labourers. Under this scheme, a financial assistance in the form of a loan will be provided to encourage cultivation and related activities.

Recently, during the assembly elections in five states, some parties promised to waive farm loans in their manifestoes. Subsequently, the new governments, including Rajasthan’s, have waived the farmers’ loans.

These developments show that loan waiver promise is a ‘vote catcher’. Consequently, most parties dole out such promises without realising the long term negative impact that populist moves like these have on the country’s economy.

We feel that the condition of our small scale industries is not good. The percentage of non-performing assets (NPAs) has been steadily rising in the industry sector.

In the agriculture sector also, NPAs are shooting through the roof due to farm loan waivers.

It would have been a very pragmatic move on the part of the government if it had waived the interest on the farm loans, and not the loans altogether.

To encourage the farmers, the government could have announced more loans with a lower interest rate for those farmers who timely repay their loans. Such incentives are a win-win situation for the both sides – the government and the farmers.

Today, India is moving towards becoming a capitalist state. And in a capitalistic state, one only talks about profit maximization. Our country will remain a laggard till we promote sustainable development in all sectors.

Recently, Congress president Rahul Gandhi said at a rally that if voted to power, his party would waive the loans of all the farmers.

Some over-enthusiastic politicians reason that when people like Nirav Modi are allowed to run away after defaulting on loans worth Rs 9000 crore, why the government can’t waive the loans of distressed farmers.

Now it is time to think whether a Nirav Modi episode can be a ground to waive the farm loans.

I feel that this policy of waiving farm loans to capture votes during elections is taking our economy in the wrong direction.

Once upon a time, our country’s economy was is such a bad shape that we had funds to purchase fuel (petrol and diesel) for only a few days. We were on the verge of bankruptcy. At that time, P.V. Narasimha Rao was the prime minister. He assigned the job to turnaround the economy to renowned economist Dr. Manmohan Singh, who later on himself became the prime minister.

It is a different thing that people ridicule him for being a ‘silent PM’. There are people who let their work do the talking.

Dr. Singh promoted liberalization, opened the country’s market, thereby giving a new lease of life to our industries.

As a result, our economy grew at a rapid pace, and the world started viewing India as an emerging economic power.

I strongly feel that politics and economics are separate things and need to be kept like that only.

As long as politicians continue to take economic decisions like that of loan waiver, our country will never have a robust economy.

I feel that Supreme Court can also play a role in ensuring that policy decisions are left to experts only.

Even former RBI governor Raghuram Rajan had recently said that farm loan waivers should not form a part of poll promises as has been the trend of late.

If we truly want to help our farmers, then we need to frame schemes which ensure more fertility of land, promote organic farming, improve the quality of our seeds and livestock. This will bring sustainable growth in our villages, thereby raising the income and living standard of our farmers.

If a government announces a waiver of say Rs 18,000 crore worth of loans, then it is imperative that it should also talk about ways to compensate the loss by generating the required revenue.

Unless there is a model to generate enough revenue, announcing a loan waiver as a poll promise is a crime, that damages the economy in a big way.

Dr. Sanjay Biyani,
Academic Director,
Biyani Group of Colleges

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स्टीफन हॉकिंगः युवाओं के रोल मॉडल

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ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी में अहम योगदान प्राप्त, 12 मानद डिग्रियों और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त स्टीफन हॉकिंग भले आज इस दुनिया में ना रहे हो लेकिन आज के युवाओं के लिए आत्ममंथन और प्रेरणा के लिए स्पष्ट पदचिन्ह छोड़ गए। 21 वर्ष की आयु में डॉक्टर्स ने हॉकिंग को बता दिया था कि उन्हें मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और उनके पास जीने के लिए दो-तीन साल शेष बचे हैं। आज हम में से किसी के साथ ऐसा हो जाए तो सम्भवतरू सिर्फ दो वर्ष भी जीना असंभव हो जाए परन्तु स्टीफन हॉकिंग ने 55 वर्ष मोटर न्यूरोन बीमारी को ही नहीं हराया बल्कि वो सब कारनामे कर डाले जो किसी भी इंसान की सर्वोच्च उपलब्धि कही जा सकती है। आज भी हम अपने जीवन में सामान्य समस्याओं से घबरा जाते हैं। स्टीफन की लगभग सभी मांसपेशियों से उनका नियंत्रण खो चुका था और वो अपने गाल की मांसपेशियों के जरिए अपने चश्में पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत कर पाते थे। हमारे सामने सवाल इस बात का नहीं होता है कि हमारे पास कौन-कौन सी शारीरिक और मानसिक दुर्बलताएं है बल्कि सवाल इस बात का है कि हम सब लोग अपनी कितनी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का उपयोग कर पाते हैं। वास्तव में हम सभी लोग अपनी इन क्षमताओं का 5 प्रतिशत भी उपयोग नहीं करते, शायद हम तो यह भी नहीं जानते कि हर कार्य कर्म नहीं होता सिर्फ वहीं कार्य कर्म होता है जो चौतन्यता यानि होश में किया जाए। हमारें ज्यादातर काम या तो दोहराव है या फिर भीड़ का अनुसरण। हमें उन सब तरीकों की खोज करनी होगी जिनके आधार पर हम जीवन के हर क्षण प्रेरित रह सके और जीवन को एक बड़े लक्ष्य से जोड़ सके। मानव जाति का विकास चुनौतियों के कारण ही तो हुआ है फिर आज हम चुनौतियों से क्यों घबरा जाते हैं। इस माह स्टूडेंटस परीक्षाओं में व्यस्त हैं मैं उन्हें ये सलाह देना चाहता हूॅ कि परीक्षाओं की तैयारी में सबसे बड़ी बाधा बार-बार उन परीक्षाओं से प्रत्याशित परीणामों को सोचने के कारण होती है। आप सभी अपना पूरा ध्यान कर्म पर लगाए ताकि आपकी अनमोल क्षमताओं का आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में सही- सही उपयोग की जा सके। मैं आपसे यह आग्रह करता हूं कि परीक्षाओं के दिनों में प्रतिदिन सुबह १५ मिनट एकाग्रता को बढ़ाने के लिए मेडिटेशन भी करे।

आज महिला सशक्तिकरण की बात की जा रही है जबकि हम सभी जानते है कि महिलाएं मानसिक रूप से पुरूषो से अधिक शक्तिशाली होती हैं। स्टीफन हॉकिंग द्वारा भी अपनी मानसिक क्षमताओं का ही उपयोग किया गया था।

इन दिनों मैंने श्रीमद्भगवद गीता का गहनता से अध्ययन किया। मैनें पाया कि श्रीमद्भगवद गीता जो कि १८ अध्याय में विभक्त है और इसमें कुल ७०० श्लोक श्रीकृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र के द्वारा कहे गये है। यह पुस्तक हमारे जीवन में उठ रहे तनाव और अवसाद को कम कर हमारी निर्णायक क्षमता को बढ़ा देती है। जो अवसाद आज से लगभग 5150 वर्ष पूर्व अर्जुन को थे कमोवेश उसी प्रकार के तनाव और अवसाद आज हम सभी के जीवन में भी है। जब हम तनाव मुक्त होकर अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाते है तो हमें ना सिर्फ बड़ी सफलताऐं मिलती है बल्कि हमारी निर्णय क्षमता बढने के साथ-साथ हमें प्रसन्नता की अनुभूति भी होती है।

मैं बड़े ही हर्ष के साथ लिख रहा हूं कि श्रीमद् भगवद् गीता पर 18 अध्याय का कार्यक्रम तैयार किया गया है। जिसे आज के परिप्रेक्ष्य में बड़ी आसान और सरल भाषा में शीघ्र ही टीवी पर प्रसारित और यूटयूब पर अपलोड करने जा रहा हूं।

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व्यक्ति समाज के लिए या समाज व्यक्ति के लिए

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स्वार्थ, स्वार्थ, स्वार्थ चारों तरफ स्वार्थपरक दुनिया बनती जा रही है। जिसको देखो येन केन प्रकारेण सबको पैसा चाहिए, प्यार चाहिए लेकिन सिर्फ अपने लिये, दूसरों को देने के लिये उनके पास न प्यार है न पैसा। स्वार्थ की धुन में कुछ लोग इतने डूब जाते हैं कि उन्हें सही-गलत का फर्क ही पता नहीं रहता। यह लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल करके देश की जनता का पैसा लूटते हैं, जैसे कि नीरव मोदी। इनकी कंपनी ने पंजाब नेशनल बैंक के साथ धोखाधड़ी करके 11,300 करोड़ रुपए का घोटाला किया है। जिसके लिए बैंक के कर्मचारियों की मिलीभगत से गलत तरीके से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग को दिखाकर आयात के नाम पर पैसा लिया गया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग एक प्रकार की गारंटी होती है जो जारी करने वाला बैंक अपने ग्राहक के लिए लेता है जिसको आधार मानकर दूसरा बैंक ग्राहक को पैसे दे सकता है।
वहीं स्वार्थपूर्ण प्रेम का एक दुखद वाकया अभी जयपुर में देखने को मिला जिसमें वेलेंटाइन डे पर निकाह नहीं करने पर एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका पर तेजाब डाल दिया। यह कैसा प्रेम है जहां सिर्फ पाने की ललक है? लगता है ये समाज किस दिशा जा रहा है?
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या ऐसे समाज में हमारी आने वाली पीढिय़ा रह पाएंगी? लोग क्यों सिर्फ अपना ही भला चाहते हैं चाहे उसके लिए उन्हें कोई गलत काम ही क्यों न करना पड़ जाए। बहुत गहराई से सोचने पर हमने जाना कि इन सारे सवालों का जवाब श्रीमद्भभगवद गीता में दिया गया है। इंसान शरीर रुपी रथ से चलता है और इस स्थूल शरीर रथ को चलाती हैं हमारी इंद्रियं जो रथ के घोड़े समान है और इन इंद्रियों को चलाता है हमारा ‘मन’ जो इन सारी समस्याओं का कारण भी है। इसलिए कहा भी गया है मन के मते न चलिये मन के मत अनेक। इंसान का मन ‘मोह’ के कारण राग द्वेष में फंसा रहता है। मन हमेशा स्वयं पर केंद्रित रहता है, यह हमेशा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इंद्रियों को अपने प्रिय विषयों की ओर खींचता रहता है।
आज समाज में धर्म की समझ खत्म होती जा रही है, शायद क्योंकि अब धर्मपरक शिक्षा व्यवस्था नहीं रही, और परिवार के सदस्यों को छोटे बच्चों को धर्म का अर्थ समझाने का समय नहीं मिल रहा है। कारण जो भी हो लेकिन आज समाज से धर्म का हृास होता जा रहा है और यह एक स्वार्थपरक समाज बनता जा रहा है जहां लोगों को जो पसंद है बस वो चाहिए चाहे उसके लिए कुछ भी गलत रास्ता अपनाना पड़े।
इंसान को आज समझना होगा कि अपने हित से पहले हमें परिवार का हित देखना चाहिए और परिवार के हित से पहले गांव का हित देखना चाहिए और गांव के हित से पहले देश का हित। अगर हम ये जानना चाहते हैं कि हमारा कोई भी कर्म धर्म के अनुसार है या नहीं तो हमें यह देखना होगा कि वह समाज हित में है या नहीं। वेदों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सूत्र वाक्य कई हजार साल पहले दे दिया था जिसका भाव था सारी पृथ्वी को अपने परिवार की तरह मान कर चलो, हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
कुछ ही दिनों में होली आने वाली है हमने पहले भी कहा है कि बुराई, भ्रष्टाचार और बेईमानी की होली जलनी चाहिए, तो आइये इस बार ”स्वार्थ’ की होली जलाएं।
इसी के साथ आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ…

Dr. Sanjay Biyani

 

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भारतीय राजनीति में योगी विचारधारा की आवश्यकता

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योगी कौन होता है ? योगी उसे कहा जाता है जो सांसारिक प्रपंचों को छोड़ कर अपना जीवन किसी एक विचार के लिए समर्पित कर देता है चाहे वो ईश्वर प्राप्ति का विचार हो, आत्म साक्षात्कार करने का विचार हो या ब्रह्म को जान लेने का विचार हो। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि योगी के जीवन का एक निश्चित लक्ष्य होता है जिसे प्राप्त करने के लिए वो कठोर स्व-अनुशासन का पालन करता है और घर परिवार का भी त्याग करने को तैयार हो जाता है।
अब बात आती है कि आखिर राजनीति में योगी विचारधारा की क्या आवश्यकता है ? सही मायनों में राजनीति एक बहुत बड़ा समाज सेवा का कार्य है जिसमे नेता को समाज के विकास और सामाजिक समस्याओं के निवारण के उद्देश्य से कार्य करना होता है । भारतीय समाज अनेकता में एकता वाला समाज है जहां तरह-तरह की सामाजिक समस्याएं भी रोज सामने आती रहती हैं । इन समस्याओं का समाधान करने के लिए भारत की जनता द्वारा 545 लोकसभा सांसद, 245 राज्य सभा सदस्य और लगभग 4120 विधानसभा सदस्यों को चुना जाता है । इन 4,910 व्यक्तियों के हाथों में सवा सौ करोड़ देशवासियों वाले इस अति विशाल परिवार को सही दिशा में ले जाने का जिम्मा होता है।
अब यह समझना जरूरी हो जाता है कि एक सामान्य इंसान जो 5-7 सदस्यों वाले अपने छोटे से परिवार को संभालने में इतना उलझा रहता है कि उसको परिवार के अलावा कुछ सोचने का समय ही नहीं मिल पाता है तो ये 4,910 व्यक्ति अपने निजी परिवार और व्यापार के साथ इतने विशाल देश को संभालने का समय कहां से निकाल पाते होंगे ?
पार्ट टाइम राजनीति की वजह से देश के विकास कार्यों की गति धीमी रह जाती है । क्यूंकि राजनेता का पूरा ध्यान उसके असली कार्य समाजसेवा में न होकर भिन्न-भिन्न कार्यों में बंटा रहता है इसलिए परिवारवाद और भाई-भतीजावाद भी राजनीति पर हावी रहता है, जिसके चलते राजनेता सिर्फ अपना, अपने परिवार का और अपने प्रिय लोगों का ही भला करने की सोचते रहते हैं। उनको यह सोचने का समय ही नहीं मिलता कि उनको पूरे देश को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।
ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या इतने विशाल देश में ऐसे 5,000 काबिल आदमी भी नहीं हैं जो एक योगी की तरह, सिर्फ और सिर्फ इस देश को चलाने के लिए अपना तन-मन और धन सब अर्पण कर सकें? एक योगी कि तरह अपने परिवार, व्यापार, रिश्तेदार का त्याग कर के 24 घंटे सिर्फ और सिर्फ देश के विकास के लिए जुट जाए। इतिहास गवाह रहा है कि वही राजनेता देश को आगे ले जाते हैं जो समाज को अपने देवता की तरह पूजते हैं, समाज के दर्द को अपना दर्द समझ कर उसे दूर करने में जुटे रहते हैं। चाहे कलाम साहब का उदाहरण ले लीजिये या अटल बिहारी बाजपेयी जी की बात करिये और वर्तमान में योगी आदित्यनाथ हों या मोदी जी इन सबके जीवन में एक समानता मिलेगी और वो है ‘योगी विचारधारा’। इनके जीवन में समाजसेवा के अलावा और कोई कार्य ही नहीं और शायद इसीलिए अपने कार्यों के बल पर इन्होने लोकप्रियता के उस ऊंचे मुकाम को प्राप्त किया जो अद्भुत है। एक लक्ष्य, एक विचार और उसके प्रति जीवन को समर्पित कर देना यही आज राजनीति की आवश्यकता है। आज राजनीति को ऐसे लोग चाहिये जिनके पास 24 घंटे सिर्फ एक ही काम हो और कोई काम ही न हो जो उनका ध्यान भटका सके। जब तक पार्ट टाइम राजनेता का समय परिवार और व्यापार में उलझा रहता है तब तक भ्रष्टाचार की भी संभावना बनी रहती है, जैसे ही राजनेता परिवार और व्यापार के झंझट से निकल जाता है तब उसे सिर्फ अपना असली काम दिखता है। हमें पूरा विश्वास है कि इस राजनीति के कीचड़ को अगर साफ किया जा सकता है तो वो योगी विचारधारा के व्यक्तियों को राजनीति में आगे बढ़ा कर ही किया जा सकता है क्यूंकि सिर्फ एक सच्चा योगी ही ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ की विचारधारा पर चलकर सारे समाज को अपना परिवार मानता हुआ, अपने जीवन को समाज कार्य में अर्पित कर सकता है। प्रेम, स्नेह व सम्मान के साथ….

To know more about Prof. Sanjay Biyani visit www.sanjaybiyani.com

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